श्री योनि स्तवराजः स्तोत्र शाक्त तंत्र की परंपरा से संबंधित है। इसमें प्रयुक्त “योनि” शब्द का अर्थ केवल शारीरिक नहीं है; तांत्रिक और दार्शनिक संदर्भ में यह सृष्टि की मूल शक्ति, आदिशक्ति, जगत की उत्पत्ति का स्रोत, देवी का सृजनात्मक तत्त्व माना जाता है। इसलिए इसके श्लोकों को उसी आध्यात्मिक और प्रतीकात्मक संदर्भ में समझना चाहिए।
![]() |
| Shri Yoni Stavaraja Stotra(श्री योनि स्तवराज स्तोत्र) | सम्पूर्ण पाठ व हिन्दी अनुवाद |
फलश्रुति के अनुसार यह स्तोत्र सभी प्रकार की सिद्धियों को प्रदान करने वाला माना गया है। कहा गया है कि जो कौलिक साधक श्रद्धापूर्वक इसका नियमित पाठ करता है, उसे अपनी साधना में सफलता प्राप्त होती है और उसके आध्यात्मिक प्रयास फलदायी बनते हैं। प्रातःकाल इसका पाठ करने से गणपति की कृपा प्राप्त होती है तथा साधक के मार्ग में आने वाले विघ्नों का नाश होता है। देवी की स्तुति के रूप में इस स्तोत्र का जप और पाठ साधक को अनेक साधनात्मक उपलब्धियाँ तथा आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करने में सहायक माना गया है। इसके पश्चात् ग्रंथ में तांत्रिक साधना, पूजन-विधि और विशेष अनुष्ठानों का भी वर्णन मिलता है। भगवान शिव स्वयं कहते हैं कि यह उपदेश उनके मुख से प्रकट हुआ है; अतः जो साधक इसे श्रद्धा के साथ ग्रहण करे, गुरु के प्रति भक्ति रखे और इसके निर्देशों का पालन करे, वह उच्च आध्यात्मिक अवस्था को प्राप्त कर सकता है। साथ ही यह भी कहा गया है कि जहाँ इस स्तोत्र का पाठ, पूजन या प्रतिष्ठापन होता है, वहाँ सदाशिव का निवास माना जाता है और वह स्थान दिव्य आध्यात्मिक ऊर्जा से युक्त हो जाता है।
|| श्री योनि स्तवराज: स्तोत्र ||
श्री महादेव उवाच--
अस्य श्री योनि स्तवराजस्य कुलाचार्य-ऋषि: कौलिकच्छन्द: ।
श्री योनि रूपा दश विद्यात्मिका देवता सर्वसाधने विनियोग:।
ॐ योनिरूपे महामाये सर्व्वसम्पतप्रदे शुभे।
कृपया सर्वसिद्धिं मे देहि देवि जगन्मयि ।। १।।
सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्ति समन्विते।
कृपया सर्वसिद्धिं मे देहि देवि जगन्मयि ।।२।।
महाघोरे महाकालि ! कुलाचारप्रिसे सदा।
कृपया सर्वसिद्धिं मे देहि देवि जगन्मयि ।।३।।
घोरदंष़ट्रे चोग्रतारे सर्वशत्रुविनाशिनि ।।
कृपया सर्वसिद्धिं मे देहि देवि जगन्मयि ।।४।।
योनिरूपा महाविद्ये सर्वदा मोक्षदायिनी।
कृपया सर्वसिद्धिं मे देहि देवि जगन्मयि ।।५।।
जगद्धात्रि महाविद्ये जगदुद्धारकारिणि।
कृपया सर्वसिद्धिं मे देहि देवि जगन्मयि ।।६।।
जगद्धात्रि महामाये योनिरूपे सनातनि।
कृपया सर्वसिद्धिं मे देहि देवि जगन्मयि ।।७।।
जय देवि जगन्मातः सृष्टि स्थित्यन्तकारिणी ।
कृपया सर्वसिद्धिं मे देहि देवि जगन्मयि ।।८।।
सिद्धिदात्रि महामाये सर्वसिद्धि-प्रदायिनि।
कृपया सर्वसिद्धिं में देहि देवि जगन्मयि ।।६।।
महालक्षिम महादेवि महा-मोक्ष-प्रदायिनि।
कृपया सर्वसिद्धिं मे देहि देवि जगन्मयि ।।१०।।
गौरी लक्ष्मीश्च मातगी दुर्गा चं नव-चण्डिका ।
बगलामुखी भुवनेशी भैरवी च तथा प्रिंये।
छिन्नमस्ता च काली च योनि-रुपा सनातनी।
कृपया सर्वसिद्धिं मे देहि देवि जगन्मयि ।।११।।
काली कपालिनी कुल्ला कुरु-कुल्ला वीरोधिनी।
नायिका विप्रचित्ताद्या अन्या या नायिका स्मृता:।
वसन्ति योनिमाश्रित्य ताभ्योष्षपीह नमो नम: ।।१२।।
अणिमाद्यष्टसिद्धिश्च वसत्यस्या: समीपत: ।
नमस्तेऽस्त्तु नमस्तेऽस्तु योग-मोक्ष-प्रदायिनि।। १३।।
सर्वशक्तिमये देवि सर्वकल्मषनाशिनि।
हे योने हर विध्न मे सर्वसिद्धिं प्रयच्छ में ।।१४।।
आधारभूते सर्व्वेषा पूजकानां प्रियम्वदे ।
स्वर्गपाताल वासिन्ये योनये च नमो नम: ।।१५।।
विष्णुसिद्धिप्रदे देवी शिवसिद्धि प्रदायिनी।
ब्रह्मसिद्धिष्रदे देवि रामचन्द्रस्य सिद्धिये।
शक्रादीनाश्च सर्वेषां सिद्धिदाये नमो नम: ।।१६।।
फ़ल्श्रुति
इति ते कथित देवि सर्वसिद्धि प्रदायकम् ।
स्तोत्र योनेर्न्महेशानि प्रकाशयामि ते प्रिये।।
सर्वसिद्धिप्रदं स्तोत्र यः पठेत् कौलिक: प्रिये।
लिखित्वा पुस्तके देवि रक्तद्रव्यैश्व सुन्दरि।।
तस्या-साध्यानि कर्म्माणि वश्यादीनि कुलेश्वारि।
नास्ति नास्ति पुनर्नास्ति नास्त्येव भुवनत्रये।
यः पठेत् प्रातरुत्थाय गाणपत्यं लभेन्नर:।।
रात्री कान्तासमायोगे यः पठेत् साधकोत्तम:।
स्तवेनानेन संस्तुत्य साधक: कि न साधयेत्।।
सालडूडतां स्वकान्ताश्व लीलाहावविभूषिताम् ।
रक्त वस्त्र परीधानां कृत्वा संपूज्य साधक: ।
भोजयित्वा ततो देवि स्वयं भुजीत तत्पर:।।
मत्स्यमांसादिकान् भुक्त्वा क्रोड़े कृत्वा स्वयोषितम्।
रात्रो यदि जपेन्मन्त्र सा दुर्गा स सदाशिव:।
भवत्येव न सन्देहो मम वकक्त्राद्दिनिर्गतम्।।
येन दत्त मयि स्तोत्र स एव मद्गुरु: स्मृते:।
तस्यैव यदि भक्ति: स्यात् स भवेजजगदीश्वर: ।।
नमोऽस्तु स्तवराजाय नमः स्तवप्रकाशिने।
यत्रास्ते स्तवराजोऽयं तत्रास्ते श्रीसदाशिव:|।
इति शक्तिकागमसर्वस्वे हरपार्वतीसंवादे श्री योनि स्तवराज: समाप्त: ।
Hindi Meanings:
यह “श्री योनि स्तवराज स्तोत्र” शाक्त-तांत्रिक परंपरा का एक स्तोत्र है, जिसमें देवी को समस्त सृष्टि की मूल शक्ति (योनि = सृजन का मूल स्रोत) के रूप में स्तुति की गई है।
प्रारम्भिक परिचय
महादेव बोले:
इस श्री योनि स्तवराज स्तोत्र के ऋषि कुलाचार्य हैं, छन्द कौलिक है, और योनि-स्वरूप दशमहाविद्या देवी इसकी अधिष्ठात्री देवता हैं। इसका प्रयोग सभी प्रकार की साधनाओं में किया जाता है।
श्लोकों का हिन्दी भावार्थ
1.
हे योनि-स्वरूप, महामाया, सभी प्रकार की सम्पत्तियाँ देने वाली शुभ देवी!
मुझ पर कृपा करके मुझे सभी सिद्धियाँ प्रदान करें, हे सम्पूर्ण जगत में व्याप्त देवी।
2.
हे समस्त रूपों में स्थित, सभी की अधीश्वरी और सभी शक्तियों से युक्त देवी!
कृपा करके मुझे सभी सिद्धियाँ प्रदान करें।
3.
हे अत्यन्त भयंकर रूप वाली महाकाली, जो कुलाचार (तांत्रिक मार्ग) को प्रिय मानती हैं!
मुझ पर कृपा कर सभी सिद्धियाँ दें।
4.
हे विकराल दाँतों वाली उग्र तारा, समस्त शत्रुओं का नाश करने वाली देवी!
मुझे सभी सिद्धियाँ प्रदान करें।
5.
हे योनि-स्वरूप महाविद्या, जो सदा मोक्ष देने वाली हैं!
मुझे सभी सिद्धियाँ दें।
6.
हे जगत का पालन करने वाली महाविद्या, संसार का उद्धार करने वाली देवी!
मुझे सभी सिद्धियाँ प्रदान करें।
7.
हे जगद्धात्री, महामाया, सनातन योनि-स्वरूप देवी!
मुझ पर कृपा करके सभी सिद्धियाँ दें।
8.
हे जगन्माता, सृष्टि, पालन और संहार करने वाली देवी!
मुझे सभी सिद्धियाँ प्रदान करें।
9.
हे सिद्धियाँ देने वाली महामाया, सभी सिद्धियों की दात्री!
मुझ पर कृपा करें और मुझे सिद्धियाँ प्रदान करें।
10.
हे महालक्ष्मी, हे महादेवी, महान मोक्ष प्रदान करने वाली!
मुझे सभी सिद्धियाँ दें।
11.
हे गौरी, लक्ष्मी, मातंगी, दुर्गा, नवचण्डिका, बगलामुखी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता और काली के रूप में स्थित सनातन योनि-स्वरूप देवी!
मुझे सभी सिद्धियाँ प्रदान करें।
12.
काली, कपालिनी, कुल्ला, कुरुकुल्ला, विरोधिनी तथा अन्य अनेक देवियाँ भी योनि-तत्त्व में निवास करती हैं।
उन सबको मेरा बार-बार नमस्कार है।
13.
अणिमा आदि आठों सिद्धियाँ भी देवी के समीप निवास करती हैं।
हे योग और मोक्ष देने वाली देवी! आपको बार-बार प्रणाम है।
14.
हे समस्त शक्तियों की मूर्ति, सभी पापों का नाश करने वाली देवी!
मेरे सभी विघ्न दूर करके मुझे सभी सिद्धियाँ प्रदान करें।
15.
हे समस्त साधकों का आधार, मधुर वचन बोलने वाली देवी!
स्वर्ग और पाताल में निवास करने वाली योनि-स्वरूप शक्ति को मेरा बार-बार नमस्कार।
16.
हे देवी! आप विष्णु को सिद्धि देने वाली, शिव को सिद्धि देने वाली, ब्रह्मा तथा रामचन्द्र को सिद्धि देने वाली हैं।
इन्द्र आदि सभी देवताओं को सिद्धि प्रदान करने वाली देवी को नमस्कार।
फलश्रुति (पाठ का फल)
महादेव कहते हैं:
- यह स्तोत्र सभी प्रकार की सिद्धियाँ देने वाला है।
- जो कौलिक साधक इसका पाठ करता है, उसे साधना में सफलता प्राप्त होती है।
- प्रातःकाल इसका पाठ करने से गणपति की कृपा और विघ्नों का नाश होता है।
- साधक इस स्तोत्र द्वारा देवी की स्तुति करके अनेक साधनात्मक सफलताएँ प्राप्त कर सकता है।
- आगे के श्लोकों में तांत्रिक साधना, पूजन-विधि तथा विशेष अनुष्ठानों का वर्णन है।
- शिव कहते हैं कि यह उपदेश मेरे मुख से निकला है; जो इसे श्रद्धा से ग्रहण करे और गुरु-भक्ति रखे, वह उच्च आध्यात्मिक अवस्था प्राप्त कर सकता है।
- जहाँ यह स्तोत्र प्रतिष्ठित या पाठित होता है, वहाँ सदाशिव का निवास माना गया है।
महत्वपूर्ण टिप्पणी
यह स्तोत्र शाक्त तंत्र की परंपरा से संबंधित है। इसमें प्रयुक्त “योनि” शब्द का अर्थ केवल शारीरिक नहीं है; तांत्रिक और दार्शनिक संदर्भ में यह सृष्टि की मूल शक्ति, आदिशक्ति, जगत की उत्पत्ति का स्रोत, देवी का सृजनात्मक तत्त्व माना जाता है। इसलिए इसके श्लोकों को उसी आध्यात्मिक और प्रतीकात्मक संदर्भ में समझना चाहिए।
श्री योनि स्तवराज स्तोत्र, Shri Yoni Stavaraj Stotra, spiritual stotra, tantra stotra, shakta tradition, divine feminine, goddess worship, hymn.

Comments
Post a Comment